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REM Sleep Behaviour Disorder : नींद में सपनों के दौरान हाथ-पैर चलाना हो सकता है खतरनाक संकेत!

Media Yodha Desk Tue, Mar 10, 2026

REM Sleep Behaviour Disorder: नींद का समय शरीर के आराम करने और दिमाग के पूरे दिन की जानकारी को व्यवस्थित करने का समय माना जाता है, इस दौरान सपने आना सामान्य बात है. कई बार ये सपने साफ-साफ याद रहते हैं, तो कभी अजीब और धुंधले लगते हैं. लेकिन आमतौर पर सपने सिर्फ दिमाग तक ही सीमित रहते हैं. हालांकि कुछ लोगों के साथ ऐसा नहीं होता. उनके सपनों के साथ-साथ शरीर भी हरकत करने लगता है. कई बार व्यक्ति सोते-सोते चिल्लाने लगता है, हाथ-पैर चलाने लगता है या अचानक बिस्तर से उठ बैठता है. पास में सो रहे लोग रात में अचानक होने वाली इन हरकतों से चौंक सकते हैं. सुबह उठने पर अक्सर ऐसे लोग बताते हैं कि उन्होंने कोई बहुत जीवंत या डरावना सपना देखा था.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

डॉक्टर इस स्थिति को रैपिड स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर कहते हैं. यह एक दुर्लभ लेकिन महत्वपूर्ण नींद से जुड़ी समस्या है, क्योंकि इसमें सोते समय व्यक्ति खुद को या अपने साथी को चोट पहुंचा सकता है. कुछ मामलों में यह दिमाग से जुड़ी अन्य बीमारियों का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. डॉक्टर ने बताया कि "रैपिड स्लीप बिहेवियर डिसऑर्डर में व्यक्ति सोते समय अपने सपनों को वास्तविक हरकतों में बदल देता है. सामान्य तौर पर REM स्लीप के दौरान ब्रेन शरीर की मांसपेशियों को अस्थायी रूप से निष्क्रिय कर देता है, ताकि हम सपनों के अनुसार हरकत न करें. लेकिन RBD में यह प्रक्रिया सही तरह से काम नहीं करती."

इसी समय आते हैं सबसे ज्यादा सपने

नींद के कई चरण होते हैं, जिनमें से एक महत्वपूर्ण चरण REM स्लीप होता है. इसी समय दिमाग सबसे ज्यादा सक्रिय होता है और अधिकतर सपने आते हैं. सामान्य स्थिति में इस दौरान शरीर की मांसपेशियां कुछ समय के लिए निष्क्रिय हो जाती हैं. लेकिन RBD में यह सिक्योरिटी पैटर्न काम नहीं करता और व्यक्ति सपने के अनुसार हाथ-पैर चलाने लगता है. ऐसे लोगों में रात के दौरान जोर से बोलना, चिल्लाना, हाथ-पैर मारना या अचानक उठ बैठना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं. कई बार वे सपने में खुद को किसी से बचाते या भागते हुए महसूस करते हैं.

किस उम्र के लोगों को होती है ज्यादा दिक्कत?

रिसर्च के अनुसार यह समस्या खासतौर पर 50 वर्ष से अधिक उम्र के पुरुषों में ज्यादा देखी जाती है, हालांकि यह किसी भी उम्र में हो सकती है. कुछ मामलों में यह पार्किंसंस जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से भी जुड़ी हो सकती है. इसकी पहचान के लिए डॉक्टर आमतौर पर पॉलिसोमनोग्राफी नाम का स्लीप टेस्ट करते हैं, जिसमें रात भर दिमाग की गतिविधि, मांसपेशियों की हलचल और सांस लेने के पैटर्न को रिकॉर्ड किया जाता है. इलाज में आमतौर पर मेलाटोनिन या क्लोनाजेपाम जैसी दवाओं के साथ-साथ सोने की जगह को सुरक्षित बनाना भी शामिल होता है.

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