75 वर्ष की उम्र में निधन : बंगाली और हिंदी सिनेमा को अलविदा कह गए दिग्गज निर्देशक पार्थो घोष
admin Mon, Jun 9, 2025
हैदराबाद से आई दुखद खबर ने सोमवार सुबह फिल्म प्रेमियों को गमगीन कर दिया, जब यह पुष्टि हुई कि प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक पार्थो घोष का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे लंबे समय से हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे और मुंबई के मड आइलैंड स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। पार्थो घोष का जाना हिंदी और बंगाली सिनेमा दोनों के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनकी पत्नी गौरी घोष इस अकल्पनीय क्षति से स्तब्ध हैं और सिनेमा जगत भी शोक में डूबा हुआ है।
पार्थो घोष का सिनेमा में सफर 1985 में शुरू हुआ था, जब उन्होंने बंगाली फिल्मों में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम करना शुरू किया। हालांकि, उनकी असली पहचान बनी 1991 में आई फिल्म ‘100 डेज’ से, जिसमें जैकी श्रॉफ और माधुरी दीक्षित मुख्य भूमिकाओं में थे। इस फिल्म ने उन्हें रातों-रात प्रसिद्धि दिला दी और वह फिल्म इंडस्ट्री के चर्चित नामों में शुमार हो गए। सस्पेंस और मर्डर मिस्ट्री पर आधारित यह फिल्म तमिल फिल्म ‘नूरवथु नाल’ की रीमेक थी, जो ख़ुद एक इतालवी फिल्म से प्रेरित मानी जाती है।
1990 के दशक में पार्थो घोष की रचनात्मकता अपने चरम पर थी। उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती के साथ 'दलाल' (1993) जैसी सुपरहिट फिल्म बनाई, जिसका गाना ‘गुटूर गुटूर’ आज भी पॉप संस्कृति का हिस्सा है। फिर आया 1996 में ‘अग्नि साक्षी’—एक ऐसी फिल्म जिसने घरेलू हिंसा जैसे गंभीर विषय को मेनस्ट्रीम सिनेमा में प्रभावी ढंग से रखा। नाना पाटेकर की दमदार परफॉर्मेंस को इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया और मनीषा कोइराला के साथ उनकी केमिस्ट्री दर्शकों को आज भी याद है।
पार्थो घोष की फिल्म ‘तीसरा कौन’ एक और मर्डर मिस्ट्री थी, जो मलयालम फिल्म की रीमेक थी और अपने ट्विस्ट्स और थ्रिल के लिए जानी जाती है। उन्होंने मिथुन और रितुपर्णा सेनगुप्ता के साथ बंगाली फिल्म ‘रहमत अली’ बनाई, जिसने क्षेत्रीय सिनेमा में उनकी उपस्थिति को और मजबूत किया। 2010 और उसके बाद भी उन्होंने सिनेमा से जुड़ाव बनाए रखा। ‘एक सेकेंड… जो ज़िंदगी बदल दे’ और ‘मौसम इकरार के दो पल प्यार के’ जैसी फिल्में उनकी फिल्मोग्राफी का हिस्सा रहीं।
निर्देशक घोष की कलात्मक शैली में जहां एक ओर सामाजिक मुद्दों की झलक मिलती थी, वहीं वे मुख्यधारा के मनोरंजन को भी अच्छी तरह साधते थे। उनकी फिल्मों में न केवल मनोरंजन होता था, बल्कि समाज को सोचने पर मजबूर करने वाली बातें भी होती थीं। ‘गुलाम-ए-मुस्तफा’, ‘युग पुरुष’ और ‘मसीहा’ जैसी फिल्में इसका प्रमाण हैं।
आज जब वह हमारे बीच नहीं हैं, तब उनके बनाए सिनेमा के दृश्य, गाने और भावनाएं ही उन्हें जीवित रखेंगे। पार्थो घोष की रचनात्मकता, शैली और सिनेमा के प्रति समर्पण को सिनेप्रेमी कभी नहीं भूल पाएंगे।
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