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CG MBBS Internship : छत्तीसगढ़ में MBBS इंटर्नशिप नियमों में बड़ा बदलाव, तय सीटों से अधिक छात्रों को नहीं मिलेगी अनुमति

Media Yodha Desk Fri, Jul 10, 2026

CG MBBS Internship: प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस सीटों और इंटर्नशिप को लेकर आयुष एवं हेल्थ साइंस यूनिवर्सिटी ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। नए नियमों के मुताबिक, प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में जितनी एमबीबीएस की सीटें स्वीकृत हैं, उतने ही छात्र वहां इंटर्नशिप कर सकेंगे। किसी भी कॉलेज को तय क्षमता से अधिक छात्रों को इंटर्नशिप कराने की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जाएगी। इस फैसले से साफ है कि यदि किसी छात्र ने अंबिकापुर, बिलासपुर, रायगढ़ या जगदलपुर जैसे अन्य सरकारी या निजी कॉलेजों से पढ़ाई की है, तो वे पैरवी या रसूख के दम पर जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज (रायपुर) में ट्रांसफर नहीं ले पाएंगे। विवि के इस फैसले से मेडिकल कॉलेजों की सिरदर्दी और आए दिन होने वाले विवाद खत्म हो जाएंगे।

रसूखदारों के ’रायपुर मोह’ पर लगाम

साढ़े चार साल की एमबीबीएस पढ़ाई के बाद छात्रों को एक साल की अनिवार्य इंटर्नशिप करनी होती है। इसके लिए उन्हें हर महीने 15000 रुपए से अधिक का स्टाइपेंड (मानदेय) मिलता है।

25 लाख पेनाल्टी

एक साल की इंटर्नशिप पूरी होने के बाद डॉक्टरों के लिए दो साल की बांड सेवा (ग्रामीण क्षेत्र में अनिवार्य सेवा) देना जरूरी है, जिसमें करीब 50000 मासिक मानदेय मिलता है। पहले बांड के तहत सिर्फ जिला अस्पतालों और सीएचसी में पोस्टिंग होती थी और वे मेडिकल ऑफिसर कहलाते थे। अब मेडिकल कॉलेजों में भी पोस्टिंग मिलने लगी है, जहां इन्हें 'जूनियर रेसीडेंट' कहा जाता है। नियम तोड़ने या बांड सेवा में न जाने वाले डॉक्टरों पर 20 से 25 लाख रुपए तक की पेनाल्टी का प्रावधान है।

छत्तीसगढ़ में MBBS इंटर्नशिप के नए नियम क्यों बने और क्या होगा असर?

प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस इंटर्नशिप को लेकर लंबे समय से क्षमता से अधिक छात्रों के समायोजन की समस्या सामने आती रही है। खासकर रायपुर स्थित पंडित जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में दूसरे सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों के छात्र इंटर्नशिप ट्रांसफर कराने की कोशिश करते थे। इससे कॉलेजों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ता था और इंटर्नशिप की व्यवस्था प्रभावित होती थी। इसी समस्या को खत्म करने के लिए आयुष एवं हेल्थ साइंस यूनिवर्सिटी ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में केवल उतने ही छात्रों को इंटर्नशिप की अनुमति मिलेगी, जितनी वहां एमबीबीएस की स्वीकृत सीटें हैं। यानी किसी भी कॉलेज को अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक इंटर्न रखने की अनुमति नहीं होगी।

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