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: धारा 498-A के दुरुपयोग पर बहस: अतुल सुभाष की आत्महत्या ने उठाए गंभीर सवाल

admin Thu, Dec 12, 2024

नई दिल्ली: बेंगलुरु के टेक एक्सपर्ट अतुल सुभाष की आत्महत्या ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-A के कथित दुरुपयोग पर एक नई बहस को जन्म दिया है। 9 दिसंबर को अपनी पत्नी और उसके परिवार से उत्पीड़न के आरोपों के चलते सुभाष ने अपनी जान दे दी। इस घटना ने समाज में इस प्रावधान के दुरुपयोग और इसके परिणामों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

धारा 498-A: एक नजर

भारतीय दंड संहिता की यह धारा पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के खिलाफ क्रूरता के मामलों को रोकने के लिए 1983 में लागू की गई थी। इसके तहत तीन साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
  • यह अपराध संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती है।
  • शिकायत महिला, उसके रिश्तेदार, या गोद लिए व्यक्ति द्वारा की जा सकती है।

वकीलों और विशेषज्ञों की राय

  1. वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने कहा:
    • धारा 498-A का दुरुपयोग समाज के ताने-बाने को कमजोर कर रहा है।
    • झूठे आरोपों के जरिए पति और उसके रिश्तेदारों को निशाना बनाया जाता है।
    • अक्सर मामलों में पैसे लेकर समझौता करने का दबाव बनाया जाता है।
  2. बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने सुझाव दिया:
    • प्राथमिकी दर्ज करने से पहले गहन जांच होनी चाहिए।
    • दुरुपयोग को रोकने के लिए कानूनी बदलाव की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट ने भी 498-A के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता जताई है।
  • जस्टिस बीवी नागरत्ना और एन कोटिश्वर सिंह ने कहा:
    • यह प्रावधान घरेलू हिंसा से बचाव के लिए है, लेकिन कुछ मामलों में इसका इस्तेमाल पति और उसके परिवार को अनुचित मांगों के लिए मजबूर करने के लिए किया जा रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि

बेंगलुरु के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस शिवकुमार ने बताया:
  • सुभाष पर उत्तर प्रदेश में कई मामले चल रहे थे।
  • उनकी पत्नी और परिवार के सदस्यों ने 3 करोड़ रुपये की मांग की थी।
  • उत्पीड़न और दबाव से परेशान होकर सुभाष ने आत्महत्या कर ली।
सुभाष के भाई ने पत्नी और ससुराल पक्ष पर मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई है।

समाज और कानून के लिए संदेश

498-A का मूल उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा देना है, लेकिन इसके दुरुपयोग से न केवल निर्दोष परिवार प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि कानून के प्रति विश्वास भी कम हो रहा है।
  • संशोधन की जरूरत: दुरुपयोग रोकने के लिए प्राथमिकी से पहले जांच अनिवार्य हो।
  • संतुलन: असली पीड़ितों को न्याय मिले, जबकि झूठे आरोप लगाने वालों पर कार्रवाई हो।
यह घटना धारा 498-A के सुधार और इसके सही क्रियान्वयन की दिशा में एक गंभीर चर्चा की मांग करती है।

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